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धाम | चंबा, हिमाचल प्रदेशकी सांस्कृतिक विरासत संस्कृति और स्वास्थ्य के साथ-साथ धाम के पर्यावरण का भी ध्यान रखती हे

Posted 1 year ago with 2259 views & 5 Comments

Story by Tejal Dabhi  •   8 mins read

Overview: चंबा, हिमाचल प्रदेश में 'धाम' एक ऐसी परंपरा जो सांस्कृतिक विरासत के साथ कुदरत का भी ध्यान रखती है और हर वर्ग के लोगों को एक सामान रखती हे।

धाम | चंबा, हिमाचल प्रदेशकी सांस्कृतिक विरासत संस्कृति और स्वास्थ्य के साथ-साथ धाम के पर्यावरण का भी ध्यान रखती हे
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कुछ ही समय पहले गुजरात से चंबा आना हुआ। चंबा नाम तो लगभग सभी ने सुना ही होगा, जी हां वही चंबा जो रावी नदी के किनारे बसा हिमाचल प्रदेश का एक खूबसूरत जिला है।

लोगो का कहना है कि चंबा अर्थशास्त्र और विकास की दृष्टि से पिछडता जिला है पर मुझे तो सुंदरता, संस्कृति, और कला का खज़ाना दिखा चंबा। हा, भौगोलिक विकास जरूर कम है पर इसलिए शायद अभी भी यहा कुदरत प्रकृति के रूप में हर जगह मौजूद है। यहां की शांति, मनमोहक सुंदरता और कला ने धीरे धीरे पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया है। ऐसा नहीं की यहां के लोग पुराने जमाने में जी रहे है, यहां के लोग भी आधुनिकता की ओर बढ़ रहे है पर अपनी प्राचीन संस्कृति को साथ लेकर और उसके साक्षी है यहां के त्योहार, परंपरा, मेले, अवसर जो की आज भी बिल्कुल वैसे ही मनाए जाते है जैसे प्राचीन समय में मनाए जाते थे। हर एक परंपरा, त्योहार मेले का अपना एक अनूठा महत्व है।

यहां आने के बाद बहुत से त्योहार पर समारोह में जाने का अवसर मिला जिसे यहां के लोग धाम डालना कहते है। कभी शादी, कभी जन्मदिन कभी सावन मास का कीर्तन और कही किसी की बरसी जैसे अलग अलग तीज त्योहारों में भोजन के लिए गए। सभी समारोह में याने कि धाम में जाके जो देखने मिला समझा और जो बूढ़े बुजुर्ग ने बताया धाम के बारे में उसे आप सब से सांझा करके बड़ी खुशी हो रही है मुझे। आप सब जानते ही है आज कल बड़े बड़े शहरों में त्योहार में भोजन समारोह में खाने की एक प्लेट की कीमत 500 से लेके 1500 रूपये तक पहुंच गई है और इतना खर्च करने के बाद भी अन्न का व्यय तो निश्चित ही है। पर यहां की जो धाम प्रथा है वो बड़ी अनूठी है। चंबयाली धाम यहा अच्छे, बुरे अवसर, धार्मिक कार्य में, या खुशी में आयोजित किए जाने वाला एक सामूहिक भोजन है। जहा एक तरफ हम पांच अतिथि घर आए तो सोचने लगते है क्या बना के खिलाए वही दूसरी ओर बड़े से बड़े अवसर पर जब धाम डालते है तो उन्हे यह सोचने की आवश्यकता ही नहीं कि हम धाम में क्या व्यंजन खिलाए, क्योंकि धाम के व्यंजन प्राचीन समय से ही तय हैं और आज भी लोग वैसे ही बनाते आ रहे है। धाम डालने वाला परिवार साधारण हो या कितना भी सुखी संपन्न क्यों न हो या कोई समूह हो सभी धाम में केवल निश्चित प्रकार के ही व्यंजन बनते है जो सच में अच्छा तरीका है सब को आर्थिक रूप से एक समान महसूस करवाने का। धाम के व्यंजन में मुख्य रूप से दो दालें जैसे की मूंग और उड़द, कढ़ी, चावल, यहां के प्रसिद्ध राजमा से बना मद्रा, मीठे चावल, खट्टा (एक तरह का खट्टा व्यंजन) और साथ में लाल और हरी मिर्च।

धाम के व्यंजन बनाने का तरीका भी बहुत अच्छा है, इन्हे बनाने के लिए स्थानीय रूप से उपलब्ध मसाले ही इस्तेमाल किए जाते है। व्यंजन को बनाने में न अधिक तेल, मिर्च या कोई भी कृत्रिम रंग, या हानिकारक मसाले का उपयोग नहीं किया जाता। इस धाम में अधिकतर दाल का उपयोग होता है और दाल के अपने स्वाद और पौष्टिकता बनी रहे इस तरह उसे बनाया जाता है। प्राकृतिक रूप से बने होने के कारण धाम स्वास्थ्यवर्धक भी है।

धाम के व्यंजन को बनाने के तरीके साथ साथ इसे परोसने का तरीका भी खास है। प्रत्येक परिवार में धाम पत्तल में ही परोसी जाती है। पहले तो धाम में उपयोग में लेने वाले पत्तल भी परिवार मिल के खुद ही बनाते थे पर अब पत्तल खरीदे जाते है, हालांकि आज भी कई परिवार है जो पत्तल खुद से ही बनाते है या जरूरतमंद महिलाएं से बनवाते है जिस से उनकी आर्थिक रूप से मदद भी हो सके। पत्तल में परोसे जाने के कारण सब लोग बैठ के खाते है और इस से अन्न का व्यय भी नही होता। बैठकर खाना, पत्तल में खाना यह हमारी प्राचीन प्रणाली है जो कि स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है और वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध भी है। अब पत्तल की जगह पेपर प्लेट हो या कही प्लास्टिक का उपयोग हो तो वो कितना हानिकारक होता है मानव स्वास्थ्य के लिए, पर्यावरण के लिए भी। पत्तल हर तरह से फायदेमंद है और आजकल तो विदेशी लोग भी इसका समर्थन करते है। धाम को परोसने के साथ साथ उसका खाने का तरीका भी वही पुराना है। आज के आधुनिक जमाने में भी धाम को हाथ से ही खाते है, चम्मच नही दिए जाते। हमारे बुजुर्ग भी हाथ से ही खाते थे और वैज्ञानिक तौर से देखा जाए तो भी हाथ से खाना खाने के फायदे भी है। आयुर्वेद भी कहता है उंगलियों के सबसे ऊपरी हिस्से की नसों के बार-बार टच होने की वजह से पाचन शक्ति अच्छी होती है. साथ ही, हाथ से चीजों को खाते समय उसकी सुगंध, स्वाद और कितना गर्म या ठंडा है उसको को बेहतर तरीके से महसूस कर सकते है।

संस्कृति और स्वास्थ्य के साथ-साथ धाम के दूसरे भी अच्छे पहलू दिखे। जैसे की हमने ऊपर बताया पत्तल पर्यावरण को नुकसान नहीं करते बल्कि पर्यावरण के लिए बहुत फायदेमंद है। अन्य पेपर प्लेट या थाली के मुकाबले पत्तल में परोसा जाने वाला भोजन स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है और खाने के बाद भी उसका कैसे निकाल करे ये समस्या भी नही होती। इसका निकाल करने के बाद भी यह बड़े ही उपयोगी होते है। उपयोग में लिए पत्तल जमीन के लिए अच्छी खाद बनाते हैं जो कि जमीन को उपजाऊ बनाता है और इस से वातावरण भी शुद्ध होता है । भूमि उपजाऊ होती है तो पैदावार भी अपने आप बढ़ती है जिस से भविष्य में होनेवाली अन्न की समस्या का समाधान भी मिल रहा है।

बड़े बड़े भोजन समारोह में जितना अन्न का व्यय होता है उतनी तेजी से जमीन से अन्न नही उगता । पूरे विश्व में जो फूड सिक्योरिटी की समस्या उत्पन्न होने का एक कारण यह भी है। जब विश्व फूड सिक्योरिटी के मुद्दो पर कार्यरत है तब यह धाम जैसी प्रथा उसका एक समाधान जरूर बन सकती है। इस धाम की अनोखी प्रथा अगर सभी लोग अपनाएं तो ना जाने कितने अन्न का व्यय होने से बचा सकेगे और कोई लोग भूखे नहीं रहेंगे।

चंबयाली धाम की यह भोजन व्यवस्था सभी को एक समान आर्थिक स्थिति का एहसास कराती है और समाज क्या कहेगा यह सोचकर कोई कर्ज के बोझ तले भी नहीं दबता। मुझे तो यह धाम आर्थिक, शारीरिक और पर्यावरण की दृष्टि से एक बेहतरीन भोजन व्यवस्था लगी। आप जब भी चंबा आए तो एक बार इस चंबयाली धाम का आनंद जरूर ले।

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